
रंक से राजा गोपाल भाँड़ कहानी
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एक दिन महाराज कृष्णदेव राय अपने दरबार में बैठे थे । राज-काज का काम सम्पन्न हो चुका था । उस दिन महाराज बहुत खुश दरबारी भी महाराज की खुशमिजाजी भाँपकर अपने-अपने आस पर बिराजमान थे ।
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महाराज ने अचानक दरबारियों से सवाल किया – “बादल क्या करता है?”
दरबारियों ने एक स्वर में कहा- “पानी बरसाता है । “
महाराज ने फिर पूछा – “बादल कैसे बनता है ? ”
“पानी जब गर्म होता है तब वह भाप में बदल जाता है और वही भाप आकाश में जाकर बादल बन जाती है।” दरबारियों ने फिर एक स्वर में जवाब दिया ।
महाराज इसी तरह कुछ-कुछ पूछते रहे और सभी दरबारी उसका जवाब देते रहे। इस बतकही के दौरान महाराज ने अचानक पूछा – “यह दुनिया किसने बनाई ?”
दरबारियों ने जवाब दिया- “भगवान ने ।”
महाराज ने फिर पूछा – “भगवान क्या करते हैं?”
इस प्रश्न के साथ ही दरबार में सन्नाटा छा गया। महाराज कृष्णदेव कुछ देर तक दरबारियों को देखते रहे, लेकिन जब कोई भी दरबारी कुछ नहीं बोला, तब उन्होंने दरबारियों को प्रेरित करते हुए कहा – “भाई, आप सभी इतने विद्वान हैं, कोई तो कुछ बोलिए।”
इसके बाद भगवान के कार्य को लेकर दरबारियों में बहस – सी होने लगी। किसी ने भगवान को दुनिया के कार्य-व्यापार चलानेवाला बताया तो किसी ने कहा कि आदमी के काम-काज में भगवान कोई दखल नहीं देते।
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भगवान के कार्य के बारे में जैसे ही कोई दरबारी अपनी कोई युक्ति देता, वैसे ही दूसरा दरबारी अपने तर्क से उस युक्ति को गलत ठहरा देता । दरबार में देर तक बहस होती रही । कोई नतीजा नहीं निकला ।
इसी बीच दरबार में गोपाल भाँड़ आया । दरबार में आकर वह अपने आसन पर बैठा और चुपचाप दरबारियों में चल रही बहस को सुनता रहा ।
महाराज जब किसी भी दरबारी की बात से सहमत नहीं हो पाए, तब उन्होंने गोपाल भाँड़ से कहा – ” गोपाल ! अब तुम ही बताओ कि भगवान क्या करते हैं?”
गोपाल ने मुस्कराते हुए कहा- “महाराज ! इस प्रश्न का उत्तर तो मैं जरूर दूँगा, मगर उत्तर पाने के लिए मुझे आप अपना राजसी लिबास धारण करने तथा राजसिंहासन पर बैठने की इजाजत दें । इसके साथ ही आप मेरे वस्त्र पहनकर मेरे आसन पर बैठें। इसके बिना इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन है ।”
महाराज कृष्णदेव गोपाल भाँड़ की तीक्ष्ण बुद्धि के कायल थे। उन्होंने इतना तो समझ ही लिया कि गोपाल इन दरबारियों से अलग किस्म की कोई बात बताने जा रहा है। इसलिए उत्सुकतावश उन्होंने वैसा ही किया, जैसा गोपाल ने कहा था ।
गोपाल राजसी लिबास पहनकर राजसिंहासन पर बैठ गया और महाराज कृष्णदेव गोपाल के साधारण लिबास में उसके आसन पर जाकर बैठ गए।
राजसिंहासन पर बैठने के बाद गोपाल ने राजा कृष्णदेव तथा दरबारियों से कहा- “ अब तक आपमें से किसी ने भगवान के कार्य के बारे में सही उत्तर नहीं दिया। मैं आपको बताता हूँ कि “भगवान क्या करता है ।” इतना कहने के बाद गोपाल भाँड़ कुछ देर के लिए चुप हो गया, फिर उसने दरबारियों से कहा- “एक बार आप मुझे देखें और एक बार महाराज को और यह बताएँ कि आप क्या समझे?”
दरबारी कुछ समझ नहीं पा रहे थे कि राजसिंहासन पर बैठा गोपाल भाँड़ उन्हें क्या समझाना चाहता है। उन्होंने एक बार गोपाल भाँड़ को देखा और फिर महाराज कृष्णदेव को । उन्हें फिर भी कुछ समझ में नहीं आया ।
उन्हें शान्त देखकर गोपाल भाँड़ ने उनसे पूछा – ” क्या आप लोगों की समझ में आया कि भगवान क्या करते हैं? ” दरबारियों ने फिर कहा – “नहीं।”
गोपाल भाँड़ ने पूछा – “महाराज और मुझको देखकर भी आप कुछ नहीं समझ पाए कि भगवान क्या करते हैं?”
दरबारियों ने जवाब दिया- “ नहीं ।”
महाराज कृष्णदेव उतावले हो रहे थे । उन्होंने गोपाल भाँड़ से कहा—“गोपाल, अब पहेलियाँ मत बुझाओ और साफ-साफ बताओ कि भगवान क्या करते हैं?”
तब गोपाल ने विनम्रता से कहा- “भगवान ही वह शक्ति है जो राजा को रंक और रंक को राजा बना दे। इसी के कारण भगवान को सर्वशक्तिमान कहा जाता है।”
गोपाल का उत्तर सुनकर दरबारी वाह-वाह कर उठे और महाराज कृष्णदेव ने प्रसन्न होकर गोपाल भाँड़ को गले से लगा लिया ।