
चींटी और टिड्डा ईसप की कहानी
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गर्मी के दिनों की बात है। एक जगह एक मैदान में एक टिड्डा यहाँ-वहाँ कूद रहा था और फुदक रहा था और बहुत चहक रहा था।
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टिड्डा बहुत मस्ती में था और गाना गाते हुए आगे बढ़ रहा था। अचानक ही एक चींटी उसके सामने से गुजरी। उसने देखा की चींटी एक मक्के के दाने को लुढ़काते हुए अपने घर में ले जाने का प्रयास कर रही है।
यह देखकर टिड्डा उससे बोला कि इतनी मेहनत और कठिन कार्य करने के बजाय आओ कुछ अच्छा समय गुजारते हैं।
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यह सुनकर चींटी ने कहा, “मैं ठंड के लिए खाना जमा कर रही हूँ और मैं तुम्हें भी यहीं सलाह दूँगी की तुम भी खाना जमा कर लो।” टिड्डे ने उसे जवाब दिया कि ठंड का मौसम आने में तो अभी काफी समय है, उसकी चिंता अभी से क्यूँ करनी। मेरे पास अभी के लिए पर्याप्त खाना है।

चींटी वहाँ से चली गई और उसने अपना काम जारी रखा। टिड्डा हर दिन उस चींटी को खाना जमा करते हुए देखता पर उसने खुद अपने लिए काम करने की नही सोची। आखिरकार ठंड के दिन आ ही गए । टिड्डा तब भूख से बेहाल हो गया और दाने-दाने का मोहताज हो गया, इसके उलट चींटी के पास खाने का भंडार था जो उसने गर्मी के दिनों में ही अपने लिए जमा कर लिए थे। वह अपने घर में जमा किया हुआ खाना खाकर आराम से समय बिताने लगी। यह देखकर टिड्डे को भी अपनी गलती का एहसास हुआ और वह सोचने लगा कि अगर उसने भी समय रहते अपने लिए खाना जमा कर लिया होता तो उसे आज दाने-दाने का मोहताज नहीं होना पड़ता।