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अथ कनौसी कथा गोनू झा की कहानी Ath Kanausi Katha Gonu Jha Story in Hindi

अथ कनौसी कथा गोनू झा की कहानी Ath Kanausi Katha Gonu Jha Story in Hindi

गोनू झा का हास -परिहास और अपने कारनामों से लोगों को शिक्षा देने की प्रकृति केवल मिथिला नरेश के दरबार तक सीमित नहीं थी ।

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वे अपनी कारगुजारियों से अपने सगे सम्बन्धियों और इष्ट -मित्रों को भी सबक देते रहते थे। एक बार उनकी चपेट में उनकी पत्नी भी आ गई ।

हुआ यूँ कि एक दिन, शाम ढले गोनू झा एक भोज में शरीक होने के लिए घर से निकलने की तैयारी कर रहे थे। गुलाबी रंग से रंगी धोती, रेशम का कुर्ता पहनकर लट्ठे का गमछा कंधे पर रख गोनू झा आइने के सामने खड़े होकर अपने को निहारते हुए अपनी मूंछें सँवार रहे थे तभी उनके कमरे में उनकी पत्नी आ गई । गोनू झा को इस तरह सजते-सँवरते देखकर पंडिताइन ने दिल्लगी की, “लग रहा है कि किसी को रिझाने की तैयारी हो रही है !”

गोनू झा मुस्कुराए और कहा- “ठीक समझी, जरा कनौसी निकाल के ले आओ (कान में पुरुषों द्वारा पहना जानेवाला एक जेवर ), कान सूना लग रहा है!” पंडिताइन ने कहा-“अरे पंडित जी, भोज-भात से रात बे-रात लौटना होगा। गाँव में चोर-उचक्कों की कमी नहीं है । कनौसी पहनने की क्या जरूरत है… आधा भरी सोने की कनौसी है। जमाना खराब है। कहीं किसी उचक्के की नजर खराब हो गई तो ?”

गोनू झा को पंडिताइन की यह शंका अच्छी नहीं लगी । उन्होंने चिढ़ते हुए कहा- “जाकर कनौसी लाओ! अब तो कनौसी पहनकर ही जाऊँगा ! और हमेशा पहने रहूँगा ! तुम्हें मेरी नहीं, आधा तोले सोने की फिक्र है। यही तुम्हारा मेरे प्रति स्नेह है? तुम्हें यह चिन्ता नहीं कि रात के अँधरे में कहीं मुझे दरबार से लौटते समय साँप -बिच्छू न डस ले, चिन्ता है आधा तोले सोने की ?”

पंडिताइन ठगी-सी रह गई । उसने सोचा भी नहीं था कि गोनू झा उसकी सलाह का ऐसा अर्थ निकालेंगे। उसने लाड़-भरे स्वरों में गोनू झा से कहा-“आपकी चिंता क्यों नहीं है ? साँप -बिच्छू डसे आपके दुश्मन को ! आप रहेंगे तो बहुत सोना आ जाएगा । सोना आपसे बढ़के कैसे हो सकता है कि मैं सोने की चिन्ता करूँ — यह लीजिए कनौसी-पहन लीजिए! मैंने तो यूँ ही आपको सचेत करने के लिए कहा था कि दिन-दुनिया ठीक नहीं…”

गोनू झा ने बीच में ही पंडिताइन की बात काटते हुए कहा-“हाँ-हाँ ! समझ गया … अब तुम्हें दिखा के मानूँगा कि तुम्हें मेरी चिन्ता है या कनौसी की !”

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गोनू झा की आवाज में तल्खी भाँपकर पंडिताइन चुप रह गई । गोनू झा ने अपने कानों में कनौसी डाली और चल पड़े भोज खाने! देर रात सकुशल लौट आए।

आम रातों की तरह उस रात पंडिताइन सोई नहीं, जागकर गोनू झा की प्रतीक्षा करती रही। पंडिताइन की मंशा थी कि वह गोनू झा को दिखाए कि वाकई वह गोनू झा की चिन्ता करती है ।

मगर गोनू झा तो गोनू झा थे। उन्होंने कमरे में प्रवेश करते ही कहा-“लो, देख लो, दोनों कान में कनौसियाँ सुरक्षित हैं ! अब जाओ और चैन से सो जाओ!”

पंडिताइन गोनू झा की बात सुनकर भौचक रह गई । कहाँ तो वह अपना पति -प्रेम प्रदर्शित करने के लिए जागरण -मंत्र का सहारा लिया था और कहाँ उसकी चेष्टा गोनू झा की दृष्टि में ‘कनौसी-प्रेम’ बनकर उभरा ! बेचारी पंडिताइन से कुछ भी कहते नहीं बना और वह जाकर सो गई ।

कुछ दिन ऐसे ही बीत गए । गोनू झा प्रायः अपनी पत्नी को, कहीं से भी लौटकर यह कहते हुए छेड़ते-देख लो, ‘कनौसी’ सुरक्षित है । बेचारी पंडिताइन उनके कटाक्ष से मर्माहत होती और अपने को मन ही मन कोसती कि न जाने किस मुहूर्त में उसके मुँह से कनौसी वाली बात निकल पड़ी !

एक दिन, सुबह में गोनू झा बिस्तर से नहीं उठे। पंडिताइन उन्हें जगाने आई तो पाया कि उनका शरीर अकड़ा हुआ है । बहुत प्रयत्न करने के बाद भी जब गोनू झा नहीं जगे तब वह बिलख-बिलखकर विलाप करने लगी । आस-पास के लोग जुटे । सबने गोनू झा के अकड़े पड़े शरीर का अवलोकन किया और सबने मान लिया कि गोनू झा गोलोकवासी हो गए । द्रवित कर देने वाले क्रंदन से गोनू झा के अन्तिम संस्कार की तैयारी जल्दी करने की जरूरत बताई और रोनेवालों को समझाया कि दुनिया में जो भी आया है उसे एक न एक दिन जाना ही पड़ता है । कोई पहले जाता है, तो कोई बाद में !”

अन्तिम संस्कार के लिए ले जाने के पहले मृतक के शरीर का स्नान कराने और चन्दनादि का लेपन करने की जब रीति निभाई जा रही थी तब बिलखती, विलापती, सुबकती पंडिताइन भी वहीं थी । जब स्नान के बाद गोनू झा के शरीर पर कफन डाला जाने लगा तब पंडिताइन सुबकती हुई बोली-“अरे देखो, उनके कान में अभी भी कनौसी है उसे खोल के दे दो !”

पंडिताइन के मुँह से ये बातें निकली ही थी कि अचानक एक झटके के साथ गोनू झा उठ के बैठ गए और उन्हें नहलानेवाले चकित और किंकर्तव्यमूढ़ से हो गए ।

गोनू झा ने बैठे- बैठे ही हाँक लगाई “क्यों पंडिताइन, ‘कनौसी’ चाहिए ?”

और पंडिताइन का आह्लादित हो रहा मन उमंग और उल्लास प्रकट करने का अवसर दे, उससे पहले ही गोनू झा की बात से वह शर्म से गड़ी-सी जा रही थी । जब गोनू झा को अहसास हुआ कि परिहास का परिणाम उनके दाम्पत्य जीवन को प्रभावित भी कर सकता है तब उन्होंने हँसते हुए कहा-“अरे पंडिताइन, शरीर नाशवान है, मिट जाता है। पदार्थ अविनाशी है, टिका रहता है। चाहे जिस रूप में टिके! तुमने कुछ भी अनुचित नहीं किया, न अनुचित कहा-मैं तो मजाक कर रहा था …”

पंडिताइन गोनू झा से लिपटकर फूट-फूटकर रो पड़ी।

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