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बाबा गुरमीत राम रहीम की तरह इन दो गुरुओं ने भी चलाई थी अपनी खुद की करेंसी

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भारत में रहते हुए गुरमीत राम रहीम अपने डेरों में एक पैरेलल सरकार चलाता था. वहां उसकी खुद की व्यवस्था, खुद के कानून और खुद की करेंसी थी. खासतौर पर करेंसी. डेरे के अंदर और बाहर भी खरीदारी के लिए दुकानें खोली गई थीं. जहां भारतीय रिजर्व बैंक की ही नहीं, गुरमीत की करेंसी भी चलती थी. इन बाबाओं का इस स्तर पर अपनी सत्ता स्थापित कर लेना चौंकाता है. आज आपको बताते हैं गुरमीत ही नहीं दो और अलग-अलग प्रतिष्ठा वाले ऐसे गुरु लोगों के बारे में जिन्होंने खुद की करेंसी चलाई. जैसे मथुरा में  रामवृक्ष यादव ने और अमेरिका-यूरोप में महर्षि महेश योगी ने. 

1. गुरमीत सिंहः ‘सच्चा शॉप’ पर चलती थी प्लास्टिक की करेंसी

गुरमीत राम रहीम की करेंसी थी प्लास्टिक के सिक्के. जिन पर लिखा होता था ‘धन धन सतगुरु तेरा ही आसरा, डेरा सच्चा सौदा सिरसा.’ सिरसा के डेरा में जो लोग दुकानों का संचालन करते थे, वे ग्राहकों को छुट्टे देने के लिए इन प्लास्टिक के सिक्कों का इस्तेमाल करते थे. डेरा परिसर के भीतर और उसके इर्द-गिर्द मौजूद इन दुकानों पर नाम के शुरू में ‘सच’ लिखा होता था. ग्राहक यदि भारतीय करेंसी यानी रुपये में खुल्ले नहीं दे पाते तो दुकानदार इनके बदले पांच और दस रुपए के प्लास्टिक के सिक्के या टोकन उन्हें दिया करते थे.

सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा का हेडक्वार्टर.

डीएनए की रिपोर्ट के मुताबिक अगर किसी कस्टमर ने इन दुकानों से कोई 70 रुपए का सामान ख़रीदा और उसने 100 रुपए दिए तो चेंज के बदले उसे 30 रुपए नहीं लौटाए जाते थे, बल्कि तीन प्लास्टिक के टोकन दे दिए जाते थे. प्रत्येक टोकन की कीमत 10 रुपए होती थी.

अपने उत्पादों का प्रचार करते हुए गुरमीत.
अपने उत्पादों का प्रचार करते हुए गुरमीत.

डेरा कैंपस करीब 1,000 एकड़ इलाके में फैला हुआ है. इसकी अपनी टाउनशिप है. अपने स्कूल हैं. खेल गांव, अस्पताल और सिनेमा हॉल भी है. ‘सच दुकानों’ पर चलने वाले सिक्के अलग-अलग कलर कोड में होते थे. सीबीआई कोर्ट ने जब गुरमीत को दोषी करार दिया तो डेरा मुख्यालय के इर्द-गिर्द हालात का जायजा लेने कुछ जर्नलिस्ट सिरसा पहुंचे थे. उन्हें भी भारतीय रुपए की जगह ऐसे प्लास्टिक के सिक्के मिले.

2. रामवृक्ष यादव : इनकी चलाई पर्ची और आरबीआई का नोट एक बराबर थे

ये वही रामवृक्ष है जिसकी वजह से पिछले साल जून में यूपी के जवाहरबाग में हुए हिंसक टकराव में 24 लोग मारे गए थे जिनमें तब के एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी और एसओ संतोष यादव की जान भी गई. 70 के दशक में पूरे उत्तर भारत में मथुरा के बाबा जयगुरुदेव की धूम थी  और ये रामवृक्ष उन्हीं के शिष्य थे लेकिन बाद में जब उसकी हरकतों का जयगुरुदेव का पता चला और उन्होंने उससे दूरी बनाई तो रामवृक्ष ने अपना अलग गुट बना लिया.

रामवृक्ष यादव

उसने आजाद हिंद सरकार नाम से एक संगठन तैयार किया. उसका खुद का बार्टर सिस्टम था. खुद की दुकानें थी. वहां पर पर्ची चलती थी. जिस परिवार को खाने-पीने या घरेलू इस्तेमाल का जो सामान चाहिए होता था उसकी पर्ची लिख दी जाती थी जो भारत सरकार की करेंसी की जगह चलती थी. संबंधित दुकान पर उस पर्ची को देकर सामान लिया जा सकता था.

जवाहरलाल में 
जवाहरबाग़ में रामवृक्ष का किला ढहाने के बाद पुलिस.

रामवृक्ष अपनी खुद की करेंसी इसलिए चलाता था क्योंकि वो राष्ट्रपति की जगह खुद को देश का प्रथम नागरिक मानता था. उसका कहना था कि किसी के पास देश की नागरिकता नहीं है. उसकी ये भी मांग थी कि आजादी के समय 1 डॉलर और 1 रुपए की कीमत बराबर थी तो आज दोनों में इतना अंतर क्यों हो गया है? वो कहता था कि उसे आज एक रुपये में एक लीटर पेट्रोल चाहिए. अगर नहीं मिलता है तो ये करेंसी फर्जी है.

3. महर्षि योगी: जिन्होंने अमेरिका और नीदरलैंड में ‘राम’ मुद्रा चलाई

महर्षि महेश योगी ने इंडिया की अपनी ‘ट्रांसेंडेंटल मेडिटेशन टेक्नीक’ (अनुभवातीत ध्यान) को 50 साल पहले ही वेस्टर्न मुल्कों में फेमस करना शुरू कर दिया था. 1968 में मशहूर रॉक बैंड द बीटल्स के मेंबर जब भारत आए तो वे महर्षि योगी से मिले और उनके साथ मेडिटेट किया. 2008 में 91 की उम्र में उनका निधन हुआ तो वर्ल्ड में उनके करीब 60 लाख फॉलोअर्स थे.

महेश योगी 1968 में इंडिया आए द बीटल्स के सितारों के साथ.

इन्हीं महर्षि योगी ने विश्व शांति के लिए विश्व शांति राष्ट्र नाम की संस्था बनाई थी जिसने 2002 में अपनी खुद की करेंसी ‘राम राज्य मुद्रा’ जारी की. 1 राम का नोट यूरोप में 10 यूरो के बराबर और अमेरिका में 10 डॉलर के बराबर होता था. इसका इस्तेमाल नीदरलैंड और अमेरिका के कई राज्यों में किया जा सकता था.img_20170702080927589c156b36b36

राम मुद्रा का नोट.

ये लीगल टेंडर नहीं होता था. इस करेंसी का इस्तेमाल परिचित लोगों के समूह आपस में कर सकते थे.

Via The LallanTop
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